Saturday, 2 July 2016

     सृजन हो रहा

स्याही कलम में हो लीन
संताप कर ह्रदय में विलीन
उद्वेलित कविमन हो रहा
जग कहता सृजन हो रहा...

शब्दों से करता प्रकृति का श्रृंगार
कभी भावों से करता दुलार
बालक कभी सजन हो रहा 
जग कहता सृजन हो रहा....

रवि, शशि, उडुगन की देख दिशा
प्रातः, दोपहर, संध्या और निशा 
कभी षड्ऋतुओं में मगन हो रहा
जग कहता सृजन हो रहा...

भारत माँ का गुणगान कभी
देश के गौरव का बखान कभी
शहीदों का भजन हो रहा
जग कहता सृजन हो रहा...

मर्यादा पुरुषोत्तम राम कभी
मुरली मनोहर श्याम कभी
माँ शारदे का वंदन हो रहा
जग कहता सृजन हो रहा...

दीपा गुप्ता

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