Tuesday, 20 November 2012

करवट

मौसम करवट बदलने लगा है,
धड़कन गीत नया गाने लगी है।

यूँ पहले भी कायल थे उनके, 
हर अदा उनकी लुभाने लगी है।

आसमान पहले भी यही था,
रौशनी नई -  सी आने लगी है।

छमछम बरसने लगी है बूँदें,
बदली - सी जैसे छाने लगी है।

एक पल की भी दूरी अब तो,
इस दिल को तड़पाने लगी है। 

Monday, 12 November 2012

दीवाली

दीयों का त्यौहार दीवाली
उजाले का उपहार दीवाली
हर्षोल्लास की उमंग ले आती हर बार दीवाली

सन्देश यही, उपदेश यही
देते हैं यही शुभकामनाएं हम,
बेकारी, भुखमरी और भ्रष्टाचार के
रावण को मार गिराएँ हम
लेकर आये सबके लिए खुशियाँ अपार दीवाली

मिलजुल कर आओ आज
एक देश नया बनाएँ हम,
रामराज लौटे फिर, महंगाई की
लंका को जीत आयें हम
तोड़ डाले ऊँच नीच, भेदभाव की दीवार दीवाली

प्रेम-प्यार हर दिल में पले
अशिक्षा को दूर भगाएँ हम,
मानवता के नाम आज
आओ एक दीप जलाएँ हम
उम्मीद से रौशन कर जाये सारा संसार दीवाली

Monday, 8 October 2012

परेशानियाँ

सभी तो परेशां हैं
फिर क्यों तुम ही
परेशानियों को ले -
परेशां हो
छोड़ दो इन्हें -
वक़्त पर ...

Thursday, 27 September 2012

मकड़ी के जालों सा

छोड़ने से छूट जाती
गर हर बात यहीं
तो क्या बात थी,
तोड़ने से टूट जाती
गर ये डोर यूं ही
तो क्या बात थी।
मकड़ी के जालों सा
चिपका है ये जाल
ज्यों इन दीवारों पर 
तोड़े हैं कितनी बार
न जाने - ये धागे
बुन लेते हैं शिकंजा
मकड़ी के जालों सा
ज्यों इन दीवारों पर।

...बिन शिशिर

कोहरे की चादर में लिपटा
सोया है शहर सारा
बिन शिशिर-
कैसा ये तुषारापात हुआ

शीत लहर सी आई,
सन्नाटा सा छाया है
नव प्रस्फुटित डालियों पर-
कैसा ये तुषारापात हुआ

बिजली सी चमकी,
बादल से टकराए हैं
अचानक पृथ्वी पर-
जैसे वज्रपात हुआ।

Sunday, 16 September 2012

चिंगारी

सीने में सुलगी चिंगारी को
कभी किसी ने देखा ?
दिल से उठता धुआँ
कभी किसी ने देखा ?
फिर क्यों आज ? क्यों आज ?
रोकते हो इन फुहारों  को
जब आग लगी थी,
तब क्या किसी ने ढूँढा था चिंगारी को ?
क्यों न देख पाए वो बादल,
जो उमड़े , गरजे , बरसे थे
फिर क्यों आज ? क्यों आज ?
टोकते हो मस्त हवाओं को ...

...हिमपात नही देखा

नर्म धूप नही देखी, सिहरती छाँव नही देखी
उगता सूरज नही देखा, ढलती शाम नही देखी
भीगी पत्तियों से बूंदों का टपकना,
तुषार में नहाये तृणों का चमकना
धुंध नही देखी अबके वात नही देखा,
हिम नही देखी अबके हिमपात नही देखा...

सर्द थपेड़े खा, अपने में सिमटना,
कमरे में आ, कम्बल में लिपटना
चिमनी नहीं देखी , उठता धुआं नहीं देखा
आंच से नम होता तन का रुआं नहीं देखा,

क्रीडा दल का हिम पर फिसलना
इधर से जाना, उधर से निकलना
पर्वतों पर जम गया प्रपात नही देखा 
हिम नही देखी अबके हिमपात नही देखा...

ऊपरे खड़े हो नीचे का नजारा
वो झांकना नीचे लेकर सहारा
अपना सा हर मंज़र अनजान नही देखा
कुछ दूरी से गुजरता यान नहीं देखा,

झाडी के फूलों की मदमाती सी चहक
निशाचरों की गूंजती, चुभती सी चहक
मृगशावक का कम्पित कोमल गात नही देखा
हिम नही देखी अबके हिमपात नही देखा...

घाटी में कहीं दूर- झील में तरती तरणी
मनोरम सुबहें, सर्द नीरव शाम सुहानी
बाघ नहीं देखे अबके मृग नहीं देखे
खुलते मुंदते उनके कोमल दृग नहीं देखे
सिमटे जोड़ों को थामे एक दूजे का हाथ नहीं देखा
हिम नही देखी अबके हिमपात नही देखा...